Tuesday, February 2, 2021

भगवान श्रीकृष्ण तत्वज्ञान के प्रचारक - पद्मेश शर्मा

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 

बिलासपुर - भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण ने भादों मास के कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र के अंतर्गत वृष लग्न में अवतार लिया। श्रीकृष्ण की उपासना को समर्पित भादों मास विशेष फलदायी कहा गया है। भाद अर्थात कल्याण देने वाला ,  कृष्ण पक्ष स्वयं श्रीकृष्ण से संबंधित है , इसमें अष्टमी तिथि पखवाडे़ के बीच संधि स्थल पर आती है। रात्रि योगीजनों को प्रिय है और उसी समय श्रीकृष्ण धरा पर अवतरित हुये । श्रीमद्भागवत में उल्लेख आया है कि श्रीकृष्ण के जन्म का अर्थ है अज्ञान के घोर अंधकार में दिव्य प्रकाश। अर्थात जीव को संसार का आकर्षण खींचता है, उसे उस आकर्षण से हटाकर अपनी ओर आकर्षित करने के लिये जो तत्व साकार रूप में प्रकट हुआ, उस तत्व का नाम श्रीकृष्ण है। जिन्होंने अत्यंत गूढ़ और सूक्ष्म तत्व अपनी अठखेलियों, अपने प्रेम और उत्साह से आकर्षित कर लिया, ऐसे तत्वज्ञान के प्रचारक, समता के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण के संदेश, उनकी लीला और उनके अवतार लेने का समय सब कुछ अलौकिक है।

       उक्त बातें रूद्र विहार-अशोक नगर बिलासपुर में श्रीमति मधु गौरहा की स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस पुरी शंकराचार्य के कृपापात्र शिष्य आचार्य श्री पद्मेश शर्मा (चाम्पा निवासी) ने श्रोताओं को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाते हुये कही। आचार्य श्री ने भगवान श्रीकृष्ण के सारगर्भित बाल-लीलाओं का कथाश्रवण कराते हुये श्रोताओं को  बताया कि भगवान रोते हुये नही बल्कि मुस्कराते हुये अवतरित हुये। जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले जनार्दन के अवतार का समय था निशीथ काल , चारों ओर अंधेरा पसरा हुआ था। ऐसी विषम परिस्थितियों में कृष्ण का जन्म हुआ कि मां-बाप हथकडि़यों में जकड़े हैं , चारों तरफ कठिनाइयों के बादल मंडरा रहे हैं। इन सभी परेशानियों के बीच भी भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराते हुये अवतरित हुये। श्रीकृष्ण ने अपने भगवान होने का संकेत जन्म के समय ही दे दिया। कारागार के ताले खुल गये , पहरेदार सो गये और आकाशवाणी हुई कि इस बालक को गोकुल में नंद गोप के घर छोड़ आओ। भीषण बारिश और उफनती यमुना को पारकर शिशु कृष्ण को गोकुल पहुंचाना मामूली काम नहीं था। वसुदेव जैसे ही यमुना में पैर रखा, पानी और ऊपर चढ़ने लगा। श्रीकृष्ण ने अपना पैर नीचे की तरफ बढ़ाकर यमुना का स्पर्श किया तब यमुना शांत हुई  और कृष्ण जी गोकुल पहुँचे। इधर कृष्ण जन्म का समाचार मिलते ही कंस बौखला गया। उसने अपने सेनापतियों को आदेश दिया कि पूरे राज्य में दस दिन के अंदर पैदा हुये सभी बच्चों का वध कर दिया जाये। इधर नंद बाबा के घर कृष्ण जन्म के उपलक्ष्य में लगातार उत्सव मनाया जा रहा था। अभी कृष्ण केवल छह दिन के ही हुये थे कि कंस ने पूतना नाम की राक्षसी को भेजा। पूतना अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर बालक कृष्ण को पिलाने के लिये मनोहारी स्त्री का रूप धारण कर आयी। अंतर्यामी कृष्ण क्रोध से उसके प्राण सहित दूध पीने लगे और तब तक नहीं छोड़ा, जब तक कि पूतना के प्राणपखेरू उड़ नहीं गये।बाल लीला के अंतर्गत कृष्ण ने एक बार मिट्टी खा ली। भैया ने मां यशोदा से इसकी शिकायत की तो मां ने डांटा और मुंह खोलने के लिये कहा। पहले तो उन्होंने मुंह खोलने से मना कर दिया, जिससे यह पुष्टि हो गई कि वास्तव में कृष्ण ने मिट्टी खाई है। बाद में मां की जिद के आगे अपना मुंह खोल दिया। कृष्ण ने अपने मुंह में यशोदा को संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन करा दिये। बचपन में गोकुल में रहने के दौरान उन्हें मारने के लिये आततायी कंस ने शकटासुर , बकासुर और तृणावर्त जैसे कई राक्षस भेजे  जिनका संहार कृष्ण ने खेल-खेल में कर दिया। नन्द बाबा जी यहाँ नौ लाख गायें नित्य दूध दिया करतीं थीं और भगवान माखन चोरी की लीला करने के लिये गोपियों के घर से मक्खन चुराते थे , वैसे माखन चोरी करने की बात कृष्ण ने कभी मानी नहीं। उनका कहना था कि गोपीकायें स्वयं अपने घर बुलाकर मक्खन खिलाती हैं। एक बार यशोदा उन्हें रस्सी से बांधने लगीं। लेकिन वे कितनी भी लंबी रस्सी लातीं, छोटी पड़ जाती। जब यशोदा बहुत परेशान हो गईं तो कन्हैया मां के हाथों से बंध ही गये। इस लीला से उनका नाम दामोदर (दाम यानी रस्सी और उदर यानी पेट) पड़ा। यमुना किनारे काली नाग का बड़ा आतंक था। उसके घाट में पानी इतना जहरीला था कि मनुष्य या पशु-पक्षी पानी पीते ही मर जाते थे। कृष्ण ने नाग को नाथ कर वहां उसे भविष्य में ना आने की हिदायत दी। कृष्ण जब गाय चराने जाते, तो उनके सभी सखा साथ रहते थे ,  सब कृष्ण के कहे अनुसार चलते थे। ब्रह्मा जी को ईर्ष्या हुई और एक दिन सभी गायों को वे अपने लोक भगा ले गये। जब गायें  नहीं दिखीं तो गोकुलवासियों ने कृष्ण पर गायों चुराने का आरोप लगा दिया। कृष्ण ने योगमाया के बल पर सभी ग्वालों के घर उतनी ही गौयें पहुंचा दीं , ब्रह्मा ने जब यह बात सुनी तो बहुत लज्जित हुये। भगवन्नाम श्रीकृष्ण ने इंद्र पूजा का विरोध करते हुये सात वर्ष की आयु में सात दिन और सात रात गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली में उठाकर कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से गोकुल वासियों की रक्षा की। बाल लीला में ही कृष्ण ने एक बार नदी में निर्वस्त्र स्नान कर रहीं गोपिकाओं के वस्त्र चुराकर पेड़ में टांग दिये। स्नान के बाद जब गोपीकाओं को पता चला तो वे कृष्ण से मिन्नतें करने लगीं। कृष्ण ने आगाह करते हुये कहा कि नग्न स्नान से मर्यादा भंग होती है और वरुण देवता का अपमान होता है, वस्त्र लौटा दिये। श्रीकृष्ण ने दिव्य व अलौकिक रासलीला ब्रजभूमि में की थी। जब सभी रस समाप्त होते हैं, वहीं से रासलीला शुरू होती है। रास लीला में प्रेम की अनवरत धारा प्रवाहित होती है। श्रीकृष्ण अपनी संगीत एवं नृत्य की कला से गोपिकाओं को रिझाते थे। इस रास में हिस्सा लेने वाली सभी गोपिकाओं के साथ कृष्ण नाचते थे। जितनी गोपी उतने ही कृष्ण। रसाधार श्रीकृष्ण का महारास जीव का ब्रह्मा से सम्मिलन का परिचायक और प्रेम का एक महापर्व है। मथुरा जाने पर सबसे पहले कृष्ण ने कुब्जा को सुंदर नारी के रूप में परिवर्तित किया। इसके बाद कंस का वध किया, नाना उग्रसेन को गद्दी पर बैठाया, 64 दिन में 64 कलायें  भगवान ने सीखा व श्री सांदीपनी गुरू के मृत पुत्र को लेकर आये। आचार्य जी ने बताया कि जरासंध ने  सेना के सामने में ब्राह्मणों को खड़ा कर दिया गया था। भगवान ब्राह्मणों पर वार नही करते थे उन्होंने सदा ही ब्राह्मणों के चरणों की वंदना की है अतः भगवान को युद्ध छोड़कर भागना पड़ा। द्वारका बसा कर भगवान द्वारकाधीश कहलाये व रूक्मणी जी का प्रणय निवेदन पत्र आते ही अत्यंत कम समय में भगवान कुण्डिनपुर पहुँच कर श्री रूक्मणी जा हरण किया व द्वारका में विधिवत विवाह किया। कथा के दौरान भगवान के जन्म , बाल-लीला , विवाह की झांकियां भी निकाली गयी और अंत में महाआरती के साथ कथा को विश्राम दिया गया।

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